प्रेरक प्रभाव (Inductive effect) क्या है? विस्तार से समझाइए।

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(N/A) परिभाषा: कार्बन श्रृंखला में मौजूद भिन्न विद्युत ऋणात्मकता वाले परमाणु या समूह के कारण सहसंयोजक बंध के इलेक्ट्रॉन युग्मों का स्थायी विस्थापन प्रेरक प्रभाव कहलाता है।
जब अलग-अलग विद्युत ऋणात्मकता वाले परमाणुओं के बीच सहसंयोजक बंध बनता है,तो इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु की ओर स्थानांतरित हो जाता है। इससे बंध में ध्रुवीयता उत्पन्न होती है।
$(B)$ निरूपण: ध्रुवीय सहसंयोजक बंधों को $\delta$ (डेल्टा) प्रतीक द्वारा दर्शाया जाता है। इलेक्ट्रॉन घनत्व के विस्थापन को एक तीर $(\rightarrow)$ द्वारा दिखाया जाता है जो कम विद्युत ऋणात्मक परमाणु से अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु की ओर इंगित करता है।
$(C)$ उदाहरण: क्लोरोइथेन $(CH_{3}-CH_{2}-Cl)$ में,$C-Cl$ बंध ध्रुवीय है क्योंकि $Cl$ की विद्युत ऋणात्मकता $C$ से अधिक है। इलेक्ट्रॉन $Cl$ की ओर स्थानांतरित हो जाते हैं,जिससे $Cl$ से जुड़े $C$ परमाणु पर आंशिक धनात्मक आवेश $(+\delta)$ और $Cl$ पर आंशिक ऋणात्मक आवेश $(-\delta)$ उत्पन्न होता है।
$(D)$ मुख्य विशेषताएं:
$(i)$ दूरी पर निर्भरता: स्रोत से दूरी बढ़ने पर यह प्रभाव तेजी से घटता है और आमतौर पर तीसरे कार्बन परमाणु के बाद नगण्य हो जाता है।
$(ii)$ योगात्मक प्रकृति: एक ही कार्बन परमाणु से जुड़े इलेक्ट्रॉन-आकर्षक समूहों की संख्या बढ़ने पर यह प्रभाव बढ़ता है।
$(iii)$ समूह की शक्ति: प्रभाव का परिमाण प्रतिस्थापी समूह की विद्युत ऋणात्मकता पर निर्भर करता है (जैसे,$-F > -Cl > -Br > -I$)।
$(E)$ प्रकार:
$(i)$ इलेक्ट्रॉन-आकर्षक प्रेरक प्रभाव ($-I$ प्रभाव): उन समूहों के कारण जो इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करते हैं (जैसे,$-NO_{2}, -CN, -F, -Cl$)।
$(ii)$ इलेक्ट्रॉन-दाता प्रेरक प्रभाव ($+I$ प्रभाव): उन समूहों के कारण जो इलेक्ट्रॉन मुक्त करते हैं (जैसे,एल्काइल समूह जैसे $-CH_{3}, -C_{2}H_{5}$)।

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List-$I$List-$II$
$(A)$ अनुनाद (Resonance)$(I)$ $C=C + H^+ \rightarrow C^+-C-H$
$(B)$ प्रेरणिक प्रभाव (Inductive effect)$(II)$ $H-CH_2-CH_2^+ \leftrightarrow H-CH_2=CH_2^+$
$(C)$ इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव (Electromeric effect)$(III)$ $C_6H_6$
$(D)$ अतिसंयुग्मन (Hyperconjugation)$(IV)$ $CH_3-Z \rightarrow CH_3^- + Z^+$
$(V)$ $CH_3-CH_2-CH_2Cl$

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